Sunday, November 12, 2017

पिन पार्वती पास से अंजान कोल : टुंडा भुज-उड़ी थाच-मानतलाई झील (Pin Parvati Pass to Unknown col : Tunda Bhuj-Udi Thach-Mantalai Lake)

27 अगस्त 2017
रात अच्छी व गर्म बीती । सूरज के साथ-साथ हम भी अपने काम पर लग गये । रात काफी ओस गिरी थी जिसने टेंट को बाहर क्या भीतर से भी नहीं छोड़ा । स्लीपिंग बैग के बाद टेंट पैक करके बैग में डाल लिया । नूपुर ने चाय तैयार कर दी । मौसम विभाग टीम के “आल द बेस्ट” के बदले हमने थैंक यू बोला । आज उड़ी थाच रुकने का प्लान है । दूसरे ग्रुप की भी वहीं डेरा डालने की मंशा है ।  तो चलो शुरू करते हैं आज का सफ़र पार्वती घाटी में ।

गद्दी जो किसी को भूखा नहीं रहने देते 

हमने टुंडा भुज 28 अगस्त (दिन 03) सुबह 8 बजे छोड़ा । देरी का कारण रात गिरी ओस थी जिसने टेंट को फुल बॉडी शावर दे डाला । पहला थैंक्स मैं सूरज देवता को देना चाहूँगा जिसने गीले टेंट को सुखाने में हमारी पूरी और जल्दी मदद करी और दूसरा थैंक्स मौसम विभाग टीम को जिसने चलते-चलते हमें मैगी बनाकर खिला दी ।  उनके हिसाब से हमें खाली पेट यात्रा नहीं करनी चाहिए ।

आगे बढ़ते-बढ़ते हम सबने एक-दूसरे के मोबाइल नम्बरों का आदान-प्रदान किया, गर्म जोशी से हैण्ड शैक हुए, कुछ चुलबुली झप्पियाँ, कई दर्जन आल द बेस्ट और चमकीली शुभकामनाओं के दौर के बाद आए अंतिम संवाद जो अभी भी याद है “भाई जी जल्द मिलते हैं” । हम चल पड़े 'मुद' की ओर पीछे छोड़ टुंडा भुज को ।

पहला आधा घंटा परेशानी बन गया कारण हम रास्ता भटक गये थे । कमर से भी ऊँची झाड़ियों से पार पाना इतना मुश्किल नहीं था जितना मुश्किल उनके गीलेपन से आई । जब हम सही ट्रेल से मिले तब तक रशियन ग्रुप और एक गद्दी भाई भी वहां पहुंच चुके थे ।

व्यर्थ हुए समय की भरपाई करने के लिए हमने स्पीड पकड़ी लेकिन जल्द ही रास्ते ने उसे धीमा कर दिया । पुराने और पारम्परिक रास्ते के हिसाब से हमें अभी तक पार्वती नदी को पार कर लेना चाहिए था लेकिन हम अभी भी उसके दाईं तरफ ही चल रहे थे कारण घाटी में पार्वती को पार करने के लिए बने एकमात्र लकड़ी के पुल का घ्वस्त हो जाना । इस पुल के टूट जाने से सबसे ज्यादा परेशानी का सामना गद्दियों और गुज्जरों को करना पड़ रहा है । अब हालात यह हैं कि उन्हें पार्वती के बाईं तरफ जाने के लिए पांडू पुल जाना पड़ता है वाया पटरा घाट जहाँ बहुत से गद्दी अपने जानवरों को पार्वती का शिकार बनते हुए देख चुके हैं ।

दूर से पटरा घाट एक काले रंग की बड़ी दीवार दिखाई देता है जिसको पार करना असंभव प्रतीत होता है परन्तु जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे एहसास होता है कि दीवार पर चढ़ना आसान होता है लेकिन इस पटरा घाट पर नहीं । घाट शुरु होते ही हमने अपनी-अपनी पानी की बोतल भर ली और गद्दी भाई के साथ-साथ आगे बढ़ने लगे ।
यहाँ पहुंचकर स्पीड काफी कम हो गई । रास्ता बेहद खराब और खतरनाक है । जब तक पटरा घाट समाप्त नहीं हो जाता तब तक ट्रैकर्स को इस फिसलन से भरी चट्टान पर चलना होगा । इस हिस्से में कई जगहें ऐसी भी हैं जहां रास्ता आपको  2 इंच चौड़े चिकने पत्थरों पर चढ़ायेगा जहां से गिरने की सजा सीधा पार्वती की कोख में समाना है । कुल मिलाकर यह हिस्सा काफी खतरनाक है और अगर यहां बारिश हो रही हो तो आप अपनी सलामती के खुद मालिक हैं ।

पटरा घाट पार करने के बाद पार्वती के दाहिनी तरफ ठाकुर कुआँ दिखाई देता है जहां न कोई ठाकुर है और न ही कोई कुआँ । एक बड़ा घास का मैदान है जिसे ठाकुर कुआँ कहा जाता है ।

गद्दी भाई की उम्र रही होगी 40 के आसपास, वो जहां भी रुकते वहीं बैठकर बीड़ी पीते । रशियन ग्रुप धीरे चल रहा था और उनका गाइड शिवराम अपने आप को कोश रहा था उनके साथ आने पर । शिवराम ने नये तथ्य सामने रखे जैसे कि “पार्वती घाटी के युवा अब सेबों की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहें हैं बजाय क्रीम के, स्वयं स्थानीय भी क्रीम के गोरखधंधे के बंद करने के हित में हैं, सेब के बिजनेस की वजह से घाटी में स्थानीय गाइड की कमी आ रही है" ।

शिवराम के तथ्यों ने मुझे कंफ्यूज कर दिया था समझ ही नहीं आ रहा था कि “जो मैं अपने आसपास होते देख रहा हूँ वो सच है या ये जो जस्ट अभी मुझे बताया गया है” । शिवराम से चलते-चलते मैंने मानतलाई के बाद के रास्ते के बारे में बात करी । उसने रात वाली कहानी फिर से दोहरा दी जिसने मेरे असमंजस को क्लियर कर दिया कि उसने आज सुबह ही खुराक फूंक ली है ।

पटरा घाट के बाद एक बार फिर से हमने स्पीड पकड़ी और सभी को पीछे छोड़कर तेजी से आगे बढ़ने लगे । आसमान में बादल छाने के साथ-साथ ठंडी हवा बहने लगी थी । चलते हुए हमे 2 घंटे से ज्यादा हो गये थे अब भूख लगने लगी थी । हमने थकते शरीर की सुनी और आगे चलकर लंच बनाने की योजना बनाई ।

बरसात का मौसम है और यह घाटी अपनी खूबसूरती के चर्म पर है । जहां देखो वहीँ खिलखिलाती हरियाली है । तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल आपका स्वागत करते हैं । पीने का पानी जगह-जगह बहता दिखाई देता है । हजार-हजार मी. ऊँचे सफ़ेद पानी के झरने किसी खुबसूरत हिरोइन की तरह पल-पल आपको लुभाते हैं । यहाँ घास है, ऊँची है, गीली है जिसने हमारी पेंट को कमर तक भिगो दिया है ।

कहीं काले बादल पहाड़ों को छेड़ रहे हैं तो कहीं सफ़ेद बादल बर्फीले पहाड़ों को शांति का संदेश देते प्रतीत होते हैं । हिमालय की यह घाटी किसी मैदान के जैसी है जिसमें फुटबाल मैदान जैसे कई लम्बे-लम्बे मैदान हैं जहां सिर्फ चलते जाना है, चलते जाना है । मैदान जो कभी खत्म नहीं होते । यहाँ होना चमत्कार है ।

रास्ते में कई गद्दी मिले जो अब नीचे जा रहे हैं । एक से बात हुई तो पता चला कि “ऊपर ठंडा बहुत हो गया है ऊपर से भालू ने भयंकर उत्पात मचा रखा है” । घाटी में कोई नीचे जा रहा है कोई ऊपर का सफ़र तय कर रहा है । खैर थोड़ा आगे बढ़ते ही दूर हमें एक छोटा सा टेंट लगा दिखाई दिया जहां कुछ लोग भी दिखाई दिए । हमने वहीं पहुंचकर लंच बनाने का तय किया ।

4 मिनट बाद हम उस छोटे से टेंट के सामने हाथ जोड़े खड़े थे जोकि गद्दियों का डेरा था । नमस्कार के बाद हमने अपना सामान नीचे रखा, पानी पिया, सांसों को संतुलित किया । हमारे पीछे शिवराम भी पहुंच गया और उसके पीछे रशियन जोड़ा भी ।

अब समझ नहीं आता कि जहां पैसे नहीं लेने चाहिये वहां लिए जाते हैं और जहां लेने चाहिए वहां बिल्कुल भी नहीं लिए जाते । ‘गद्दी शुद्ध इंसानों’ ने हम सबको चाय पिलाई, भेड़ का दूध पिलाया, तुरंत चपाती बनाकर खिलाई जैम और भेड़ के देशी घी के साथ, चावल खिलाये । इसके बाद भी उन्होंने हमारी सकुशल यात्रा के लिए ढेरों बधाइयाँ दी जिसके बदले में हमारे पास कुछ नहीं था उन्हें देने के लिए सिवाय उनकी ख़ुशी और सेहत की कामना करने के ।

लगभग 1 घंटे के बाद हमने यहाँ से कूच किया । 30-35 मिनट लगातार चलने के बाद हम पहले पांडू पुल पर पहुंचे । यहाँ पहुंचने से पहले मैं इसे लकड़ी का पुल समझ रहा था लेकिन यह तो एक बड़ा बोल्डर है जो शिकारी नदी पर बस पड़ा भर हुआ है । हम दोनों ने एक-दूसरे की सहायता से इसे सुरक्षित पार कर लिया । 15 मिनट का समय लगा इससे पार करने में । यह एक बड़ा बोल्डर है और इसकी पोजीशन इस प्रकार है कि जब भी इसे पार किया जायेगा तब-तब आपको नीचे उफनती नदी में गिरने का डर सताएगा । और अगर यह बारिश से गीला हो जाये तो हो सकता है आप फिसलकर पागल नदी का ग्रास बन जाओ ।

अगले 15 मिनट बाद हम दूसरे और अंतिम पांडू पुल पर पहुंचे । यह पार्वती नदी पर पड़ा है और बहुत बड़ा बोल्डर है, पहले वाले से भी बड़ा लेकिन यह खतरनाक नही है । इसका आकर इसे मुश्किल दिखाता है लेकिन है नही । इसे पार करते हुए तो हमने फोटो भी खींचे परन्तु पहले वाले पांडू पुल ने हमें सिर्फ एक ही क्लिक करने का मौका दिया ।

शिवराम के हिसाब से पहले पांडू पुल को पार करने के बाद लम्बी घास खत्म हो जाएगी परंतु लम्बे मैदान जारी रहेंगे । मौसम धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा है और हमें चलते-चलते घंटों हो गयें हैं परन्तु अभी तक उड़ी थाच का कोई अता-पता नहीं है । मेरे जूते फटे होने के कारण कल से ही भीगे हैं जिनसे मुझे काफी तकलीफ हो रही है । गद्दियों ने बता दिया था कि उड़ी थाच में लकड़ियाँ कम ही मिलेंगी इसलिए हो सके तो रास्ते से ही ले जाना । उनकी सलाह मानते हुए मैंने रास्ते से ही काफी सारी लकडियाँ अपने रकसैक पर बाँध ली ।

जब यह भी न पता हो कि उड़ी थाच कैसा दिखता है तब हमारा स्टेमिना जवाब देने लगता है और यही हाल हमारा होना शुरू हो गया । हमने जल्द-से-जल्द समतल जगह खोजनी शुरू करी दी जहां पीने का पानी भी हो । खोज 20 मिनट बाद खत्म हुई बैग-वेग रखकर हम बस टेंट लगाने ही वाले थे कि दूर मुझे शिवराम आता दिखाई दिया । 10 मिनट में उसने हमारे पास पहुंचकर बताया कि उड़ी थाच 1-2 किमी. और आगे है वहाँ पानी और टेंट के लिए बढ़िया जगह है ‘चलो वहीं चलते हैं’ । सच बताऊँ ये 1-2 किमी. इतने दूर महसूस हुए जितना दूर चाँद ।

उड़ी थाच एक और घास का समतल मैदान है जहां लगभग 50-60 टेंट आराम से लग सकते हैं । 8-10 टेंट लगाकर तो यहाँ क्रिकेट भी खेला जा सकता है । नदी के साथ ही पीने का मीठा पानी भी मौजूद है । यह स्थान पार्वती नदी के बाईं तरह है । पीछे मिले गद्दियों ने सही बताया था कि उड़ी थाच में एक भी गद्दी नहीं मिलेगा । घाटी में गद्दी हैं लेकिन यहाँ नहीं । नदी पार बड़े ग्लेशियर के नीचे 2-4 गद्दी डेरे दिखाई दे रहें हैं, उनके और हमारे बीच पार्वती नदी है, नदी जिसमें करंट भाग रहा है ।

बैग से टेंट निकालकर 10 मिनट में दोनों ने टेंट को खड़ा कर दिया, मैट्रेस बिछा दिया, बैग अन्दर रख दिए । रिलैक्स होने के बाद नूपुर ने झटपट गर्मागर्म मीठी चाय बना दी जिसने भीतर जाते ही अपना कमाल दिखा दिया । रशियन ग्रुप थोड़ी देर से आया तब तक हमने शिवराम को भी एक पियाला चाय का चखा दिया ।

गर्म और मीठी चाय ने शिवराम को मजबूर कर दिया आगे का रास्ता बताने को । उसने बताया कि “मानतलाई से बेस कैंप तक पगडण्डी साफ-साफ दिखाई देती है, एक-दो बार नाले पार करने पड़ेंगे जोकि ज्यादा गहरे नहीं होंगे आजकल, बेस कैंप के बाद रास्ता ऊपर ले जायेगा, जब तक ग्लेशियर न आ जाये तब तक चलते रहना । ग्लेशियर के बिल्कुल नीचे हाई कैंप लगता है । हाई कैंप से पास तक 2 घंटे लगते हैं । ग्लेशियर पर चलते-चलते आप लोग ऐसी जगह पहुंचोगे जहां ग्लेशियर कटोरी जैसे आकार में दिखाई देगा बस वहाँ से आप समझ जाओगे कि कहां जाना है” ।
शिवराम की सारी जानकारी को हम दोनों ने अपने-अपने दिमाग में स्टोर कर लिया । तो सीन यह है कि जहां ग्लेशियर कटोरी बन जाये समझो पहुंच गये पपप पर । बस 2 दिन और फिर हम पिन पार्वती पास पर ।

उड़ी थाच टुंडा भुज से 16 किमी. दूर है और 3803 मी. हाईट पर है । यहाँ हवा ठंडी और तेज है, पहाड़ों की चोटियाँ ने बर्फ का मफलर बांधा हुआ है, कहीं-कहीं हैंगिंग ग्लेशियर भी दिखाई दे रहे हैं, बादल तेज हवा के इशारों पर पहाड़ी डांस कर रहें हैं, नदी की आवाज तेज पर मधुर है, कोवे तेज हवा में संतुलन बना रहें हैं,  दोपहर की धूप ने पत्थरों को गर्म कर दिया है, हम बोल्डरिंग कर रहें हैं, हाथ सुन्न हो रहे हैं, नूपुर मेडीटेशन कर रही हैं, गो-प्रो टाइम-लेप्स शूट कर रहा है, रशियन ग्रुप योगा कर रहा है, शिवराम बर्तन धो रहा है, सूरज घाटी से जाने की आज्ञा मांग रहा है, घाटी बादलों का रंग बदलकर परमीशन दे रही है । #फीलिंग_द_बेस्ट_ऑफ़_नेचर

सिलिंडर की गैस बचाने के लिए हमने आज खाना लकड़ियों पर बनाया । स्मोक्ड मैगी किसी शाही पनीर से कम नहीं लग रही थी । लग्जरी दावत के बाद हमने शाही चाय का भी लुत्फ़ उठाया । आग ने जलते ही पड़ोसियों को भी आकर्षित कर लिया । नूपुर रशियनस से लगातार इंग्लिश में बातें कर रही है, और मैं समझने की नाकाम कोशिश कर रहा हूँ । बाद में शिवराम ने बताया कि कल टेंट यहीं छोड़कर मानतलाई घूमकर वापस यहीं रात बिताएंगे । मादा रशियन एक्साइटेड है हमारे अकेले ‘पपप’ को पार करने को लेकर । नर रशियन देशी बीड़ी सुलगाने में व्यस्त है ।

बारिश शुरू हो गई, आनन फानन में सभी अपने-अपने टेंटों में भागे । समय रात के 9 बजे हैं, बारिश बंद हो गई है । यहाँ मौसम थोड़ा ज्यादा ठंडा हैं । नूपुर अपने स्लीपिंग बैग में प्रवेश कर चुकी है । मैं मैट्रेस नहीं लाया हूँ इसलिए मौसम विभाग टीम से एक प्लास्टिक का बौरा ले आया अपने नीचे बिछाने के लिए । बौरे और फ्लीज को नीचे बिछा लिया है, पैरों में फुट पाउडर लगाकर गर्म जुराब पहन लियें हैं, लाइट पास ही रख ली है, आज के पूरे दिन के बारे में सोच लिया है और अब वक्त है स्लीपिंग बैग में घुसने का ।

कल से हम दोनों एक-दूसरे के भरोसे चलेंगे, रहेंगे । आशा करता हूँ आगे का सफ़र अच्छा रहेगा । कल का प्लान मानतलाई से थोड़ा आगे जाकर टेंट लगाने का है । मौसम ठीक रहा तो शायद बेस कैंप तक पहुंच जायें । आगे का रास्ता शिवराम ने समझा ही दिया है बाकी कोर्डिनेट्स तो हैं ही हमारे पास । सोचते-सोचते नींद आने लगी ।
और फिर से बारिश शुरू हो गई ।

29 अगस्त (दिन 04) को हमने उड़ी थाच 11:15 बजे छोड़ा मानतलाई के लिए । सवा ग्यारह बहुत लेट समय है आगे की यात्रा के लिए लेकिन रात से होती बारिश ने हमें रुकने पर विवश कर दिया । हम दोनों खराब मौसम में बिल्कुल भी ट्रैकिंग नहीं करना चाहते थे । 9:30 बजे जब रशियन ग्रुप ने उड़ी थाच छोड़ा मानतलाई के लिए तब तो हमे भी आग लग गई आगे बढ़ने की । जल्द ही हमने चाय और मैगी का नाश्ता करके आगे बढ़ना तय कर लिया ।

गीले टेंट को पैक करके रकसैक में डाल लिया, रकसैक को रेनकवर पहना दिया, खुद भी हमने अपने आपको पोलिस्टर के हवाले कर दिया । धीमी बारिश में निकल पड़े लेकिन लगभग 20 मिनट बाद बारिश ही बंद हो गई जिसने हमे स्पीड बढ़ाने का मौका दे दिया ।

रास्ते में काफी ऐरिया ऐसा है जहां गीली जमीन (Wet Land) है, यहाँ कदम रखते ही धंसते हैं । गद्दियों के काफी सारे डेरे दिखाई दिए लेकिन सभी खाली । जब-जब बादल हटते हैं तब-तब हमे सामने बर्फीले पर्वत दिखाई देते हैं । पूरे रास्ते पीने के पानी की कोई कमी नहीं है । पगडण्डी अच्छी बनी हुई है, सीजन में आराम से अकेले भी जाया जा सकता है । पूरा रास्ता रोलिंग हैं, रोलिंग मतलब कभी ऊपर ले जाता है तो कभी नीचे उतारता है । घाटी के इस हिस्से में पेड़ बिल्कुल नहीं है, हाँ लेकिन घास बहुत है ।

हम तेज चल रहे थे, तेज का मतलब सच में काफी तेज था, हमे लग रहा था कि हम रशियन ग्रुप को पकड़ लेंगे । नॉन-स्टॉप चलते हुए हम वहां पहुंचे जहां से मौरेन ऐरिया शुरू जाता है । दूर ऊपर मानतलाई से आती पार्वती दिखाई दे रही है जोकि बहुत तेज और ठंडी है ।

मौसम अभी भी खराब है कभी भी तेज बारिश या बर्फ गिर सकती है । मुझे लगा था कि आज कोई-न-कोई 'मुद' से इस तरफ आता दिखाई देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ ऊपर से रशियन ग्रुप भी बड़ी तेजी से काफी आगे निकल गया ।

मौरेन है, चढ़ाई है, मौसम ठंडा और हवा तेज है, अकेले हैं, पहाड़ों पर बर्फ है बॉडी पर रेनवियर, साँसे फूली हैं, शरीर में थकावट है, मन में चिंता गीले होने की, जूते आज भी गीले हैं और रशियन पता नहीं कहां गायब हैं ।
“वो रहा शिवराम”, नूपुर को बोलकर मैं और तेजी से उनकी ओर बढ़ा । शिवराम का रास्ता रोककर मैंने एक बार फिर से आगे के रास्ते का हुलिया जानना चाहा । “ग्लेशियर से नीचे हाई कैंप है, वहाँ से ग्लेशियर पर चढ़ना, ऊपर पहुंचकर कटोरी जैसा ग्लेशियर आयेगा जिसे पार करने के बाद आप खुद समझ जाओगे”, बोलकर वो तेजी से नीचे भागा उसे भी खराब मौसम का डर सता रहा था । मादा रशियन ने हमे “आल द बेस्ट” बोला, नर रशियन अभी भी बीड़ी जलाने का प्रयास कर रहा है ।

समय दोपहर के 2:00 बजे थे जब हम मानतलाई के किनारे पर खड़े थे । यहाँ की ऊँचाई 4203 मी. है और यह झील उड़ी थाच से 11 किमी. दूर है । हम आज सुबह 11:15 बजे चले थे और दोपहर 2 बजे पहुंच भी गये । शिवराम के हिसाब से हमे झील से थोड़ा आगे जाकर टेंट लगाना चाहिए जहां प्रॉपर कैंप साइड है ।

मानतलाई कोई प्रॉपर झील नहीं है ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसके मुहाने का रास्ता दाईं तरफ से आये लैंड-स्लाइड ने रोक लिया है । और इसी वजह से यह जगह एक बाँध जैसी प्रतीत होती है जिसमें बहुत सा पानी इकठ्ठा है । गद्दियों की माने तो बहुत साल पहले इस झील में इतना पानी नहीं होता था लेकिन जब से पहाड़ खिसका तब से यह झील पानी-पानी हो गई । एक गद्दी भाई तो इस झील को पानी में घुसकर कई बार पार भी कर चुके हैं ।

प्रॉपर कैंप साइड की ओर बढ़ते ही बारिश तेज होने लगी । पहले तो हमने भीगते-भीगते ही आगे बढ़ने का फैसला किया लेकिन ठण्ड और बारिश की बढती स्पीड ने हमारी स्पीड को स्टॉप कर दिया । झील किनारे पड़े एक बड़े बोल्डर के नीचे बैठकर हमने रेस्ट और इंतजार करने की सोची ।

पानी पिया, चोकलेट खाई, टॉफी खाई, साँसे नियंत्रित करी फिर भी बारिश नहीं रुकी ऊपर से और तेज हो गई । समय 2:50 हो गया ऐसे मौसम में आगे नहीं बढ़ सकते । दोनों ने आपसी सहमती से वहीं टेंट लगाने का निश्चय किया । टेंट लगाने में 10 मिनट लग गये, इन 10 मिनटों में बरखा रानी ने हमें पूरा भिगो दिया । नूपुर ने सारा सामान टेंट में रख लिया और मैं चल पड़ा पीने के पानी की तलाश में ।

झील का पानी आज तो पिया नहीं जा सकता क्योंकि इसमें बहुत रेत मिला है । गद्दी बताते है मानतलाई का पानी साफ़ भी होता है फिर पिया भी जाता है । तो पानी की तलाश में मुझे 1 किमी. आगे जाना पड़ा जहां एक गड्डा मिला जिसमें नीचे रेत था ऊपर पानी लगभग साफ़ ही था । 2 बोतल भरकर जब टेंट में पहुंचा तब मैं सच में पूरा भीग चुका था । तेज बारिश ने रेनवियरस को फ़ैल कर दिया था ।

पानी लाते वक़्त मुझे गद्दी की एक गुफा भी दिखी थी जिसमें मुझे दाल मिली, कच्ची दाल । इट मीन्स आज दाल बनेगी । नूपुर चाय बनाने लगी जबकि मैं गीले कपड़ों से जूझने लगा । हमारे टेंट के नीचे भी वेट लैंड है इसलिए यह रात बहुत ठंडी होने वाली है ।

शरीर गर्म होने से कपड़े भी धीरे-धीरे सूखने लगे । अब वक़्त था सूप बनाने का तो हमने सूप में चने की दाल डाल दी । 25 मिनट बाद जब छोटा गैस छटपटाने लगा, तब हमें गैस बंद करन पड़ा । पतीली में सूप तैयार हो गया था लेकिन दाल ने हिम्मत न हारी और 25 मिनट बाद भी वो कच्ची ही बनी रही । सूप के साथ कच्ची दाल भी इसलिए खा ली कि कुछ तो एनर्जी मिलेगी, वैसे स्वाद तो एकदम ही बुरा था ।

शाम के 7 बज गये हैं और बारिश अभी भी हो रही है । काले बादलों ने घाटी को आज जल्दी ही रात का निमंत्रण दे दिया है । झील के पानी की सरसराहट तेजी से आ रही है और आये भी क्यों न हम सिर्फ 15 फीट दूर तो हैं झील से । न जाने यहाँ रात कैसे कटेगी । परेशानी अकेले होने की नहीं बल्कि लगातार होती बारिश की है, ऐसा न हो जाये कि झील के पानी का स्तर बढ़ जाए टेंट उसपर तैरने लगे ।

प्लास्टिक के बौरे और गर्म फ्लीज को मैट्रेस की तरह नीचे बिछाकर मैं भी स्लीपिंग बैग में घुस गया और सोचने लगा कुछ तथ्यों के बारे में जैसे कि “आशा करता हूँ बाहर रखे जूतों को भालू नहीं ले जायेगा, वैसे भी उनमे बदबू काफी हो गयी है, हाँ फट गयें हैं और गीले भी तो हैं । सुबह से बारिश हो रही है पता नहीं कल भी मौसम खुलेगा या नही ? अगर नही तो हम एक और दिन इंतजार कर सकते हैं इसके साफ़ होने का । टेंट भी हमने गलत जगह लगा लिया है बिलकुल झील किनारे, यहाँ की जमीन दलदली है और ठंडी भी बहुत है ।

आज यहाँ सिर्फ हम दो ही हैं एक-दूसरे की रक्षा के लिए, आई होप की कुछ अनहोनी नहीं होगी । यहाँ हवा भी तेज है ऊपर से ठण्ड भी बेहिसाब बढ़ती जा रही है, आखिरी आशा कि हम हाईपोथर्मिया का शिकार नहीं बनेंगे”, सोचते-सोचते मुझे नींद आ गयी ।

पार्वती नदी और टूटा पुल 

पटरा घाट की शरुआत

पटरा घाट की चुनौतियाँ (PC : Nupur)

शिवराम, गद्दी भाई और नूपुर पटरा घाट से जूझते हुए

पटरा घाट अभी भी जारी है

पार्वती नदी के दाईं तरफ दिखता ठाकुर कुआँ 

शुरू हुआ वापसी का सफ़र 

गद्दी भाई जिन्होंने हमें खाना खिलाया, टिन पर तार-तार बकरी जिसे कल रात को भालू ने मारा 

पहले पांडू पुल को पार करती नूपुर

बड़ा पांडू पुल

बॉन फायर की सामग्री (PC : Nupur)

कुल्लू आइगर पर्वत (5646 मी.) (PC : Nupur)

थोड़ी बोल्डरिंग हो जाये (PC : Nupur)

रशियन जोड़े का टेंट

कुल्लू आइगर पर्वत (5646 मी.)

हमारा टेंट उड़ी थाच में 

मानतलाई झील की ओर

इन पहाड़ों के पीछे कहीं स्थित है देबसा पास

इस नज़ारे के साथ दिन शुरू हुआ...

मानतलाई से पहले 

दाईं तरफ दिखता लैंड स्लाइड जिसने मानतलाई को झील बनाया 

मानतलाई झील 

8 comments:

  1. जबरदस्त रोहित भाई।

    आब तो बस 1 साथी मिल जाये यह जाने के लिए। निकल पड़ेंगे बस।
    आगर आप दुबारा जाना चाहो तो 7876757717 पर फोन कर लेना जी।
    ओर हैं, मैं 2 हफ्ते नमकीन बिस्किट ओर पानी पर काट सकता हूँ जी

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    1. अक्षय भाई खुद से बड़ा कोई साथी नहीं, जानकारी जुटाओ और निकल पडो । दुबारा जाना है अगले साल । इस ट्रेक ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है । बाकी स्वागत है आपका ।

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  2. उत्सुकता बढती जा रही है। रोमांचक यात्रा..

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    1. संदीप भाई को नमस्कार, पोस्ट पढने के लिए धन्यवाद । अगला पोस्ट जल्दी ही आपकी नज़रों के सामने होगा....बेस्ट व्हिसेस

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  3. शानदार खतरनाक यात्रा विवरण

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    1. शुक्रिया व् शुभकामनाएंपरिहार साब...

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  4. लाजवाब लिखा है मजा आ गया पड़ कर

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    1. यह जानकार मुझे भी बेहद मजा आया । शुभकामनाएं...

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