Wednesday, November 8, 2017

पिन पार्वती पास से अंजान कोल : मनाली-खीरगंगा-टुंडा भुज (Pin Parvati Pass to Unknown col : Manali-Kheerganga-Tunda Bhuj)

26 अगस्त 2017
कई दिन खूब सोचा कि कहाँ घूमने जाएँ । सवाल ने 2 जगहों के सामने खड़ा कर दिया, पहली ‘बीड़ से मनाली वाया थम्सर पास’, और दूसरी ‘इंद्रहार, गुप्त झीलें व मिन्कियानी पास’ । धौलाधार की ‘हाई झील्स’ थम्सर पर भारी पड़ी और अगले ही पल पीली चिट दीवार पर चिपक गई “चलो हाई झील्स” । घुमक्कड़ी के वायरस ने दिमाग घुमा दिया कभी गूगल पर ‘मैप’ देखूं, कभी ‘ब्लॉग’ पढूँ, और कभी अनचाही ऐड मुझे अनाकाली समझकर सन्देश दें “सिर्फ 5 दिनों में कैसे बनाएं अपनी त्वचा को गोरा” । हैश टैग : ट्रैक + तैयारी = त्यौहार

देवता का आगमन पार्वती घाटी में 

20 अगस्त की सुबह तक मैं और नूपुर प्लान से चिपके हुए थे लेकिन दोपहर को गुडगाँव गुरुग्राम से एक फ़ोन आया जिसके बाद ‘हाई झील्स’ का प्लान कैंसिल हो गया । पहले हम दुखी हुए और फिर खुश । दुखी इसलिए कि पीली चिट पर क्रोस करना पड़ा और खुश इसलिए कि नई चिट लग गई थी “पपप, पिन पार्वती पास” की ।

तैयारियों ने जोर पकड़कर मुझे बिदका दिया । दिन दहाड़े मेरे सामने एक छोटे चूल्हे और उसके 230 ग्राम. के बच्चे  (सिलिंडर) को ऐसे पेश किया गया जैसे संसद में बजट । नेता बनकर मैंने भी खुलेआम उसकी आलोचना की कि “ये क्या है”? । “iphone x है, क्या बाबा इतना तो पता होना चाहिए कि यह पोर्टेबल चूल्हा है”, बोलकर नूपुर ने उसे जलाकर दिखाया । “और हम इसे अपने साथ ले जा रहे हैं”, कहकर उसने उसे बुझा दिया । “यह नहीं हो सकता”, कर्रप्ट नेता की तरह बोलकर मैंने बजट के विरोध में नारे लगाए ।

विरोधी पार्टी की नेताइन ने सफाई मांगी । “इतना वजन कौन उठाएगा” साफ-साफ शब्दों में बोलकर मैंने सफाई दर्ज करायी । “अपना नहीं तो कम-से-कम मेरा तो ख्याल करो, बिस्कुट और टॉफी के सहारे मेरा चलना मुश्किल है”, बोलकर उसने शायद इमोशनली ब्लैकमेल करना चाहा । इस बात का मैंने भी समर्थन किया कि “बिस्कुट और टॉफी के पहियों पर 11 नंबर की गाड़ी को 6-7 दिन चलाना मुश्किल काम है” । नेताइन खुश लग रही थी मेरे ब्लैकमेल होने पर लेकिन उसे क्या पता कि मैगी और चाय का जलवा मुझपर चल चुका था ।

अगले दिन तैयारियाँ इन्टरनेट की तरफ मुड़ी हमने कुछ ब्लॉगस को देखा, पढ़ा लेकिन सब बेकार क्योंकि उनके हिसाब से यह ट्रेक भारत के टॉप 10 खतरनाक ट्रेकों में से एक है । ‘टॉप 10 खतरनाक ट्रेकों’ का जिक्र आते ही मैंने पहले अपनी ओर फिर नूपुर की ओर देखा, नतीजा यह है कि मैं खतरनाक नहीं हूँ लेकिन क्या पता नूपुर मुझे खतरनाक मानती हो, वैसे भी कभी-अभी भ्रम पालना अच्छा होता है । जांच-पड़ताल के बाद मैंने इस ट्रेक के कोर्डिनेट्स नूपुर को भेज दिए इस उम्मीद में कि ये हमारे अच्छे गाइड साबित होंगे और हाँ फ्री भी ।

पैकिंग में हमने स्लीपिंग बैग, टेंट, मैट्रेस, कैमरा, गो प्रो, छोटा चूल्हा व उसका सिलिंडर, बर्तन, पानी की बोतल, मोबाइल, कपड़े और छोटा मोटा-सामान बैग में भरा । हमने 5 दिनों का राशन अपने-अपने बैगों में पैक करा । आज मुझे अपना बैग बैग कम बिजार (Bull) ज्यादा लग रहा था जिसने अपनी कमर पर पानी की बोतल लटका रखी थी । #बैग_बना_बिजार

23 अगस्त तड़के जब हमने बीड़ छोड़ा तब हम हंसी का पात्र बने हुए थे । हंसने की बात ही थी मैं 50 किग्रा. 500 सीसी बुलेट जो चला रहा था ऊपर से बुलेट को हम दोनों ने जोकर बना दिया था । कहीं रैकसैक बंधा था, कहीं स्लीपिंग बैग तो कहीं मैट्रेस और ऊपर हम दोनों एक-एक अतिरिक्त बैग के साथ ।

पधर में कुछ दिनों पहले अति भयंकर भूस्खलन हुआ है जिस वजह से हमें घटास्नी से झटीँगरी वाला रूट लेना पड़ा । बरसात में धौलाधार रेंज के निकट वाले सभी इलाकों में लगातार भीषण बारिश होती है जिस वजह से मानसून इस इलाके की पक्की सड़कों को चीर-फाड़ देता है । मानसून की मनमानी का खामियाजा हम दोनों को उठाना पड़ा बुलेट के नीचे दबकर । नूपुर ने सुरक्षित लैंड किया जबकि बुलेट में मेरे उल्टे पैर को अपना शिकार बनाया ।
“हड्डी गई”, पड़े-पड़े मैंने सोचा । खड़े होने पर पता चला कि हड्डी तो बच गई है लेकिन घुटने का ‘दम घुटने’ से उसमें दर्द की लहर दौड़ पड़ी है । 10-15 मिनट बाद जब दर्द कम हुआ तो दोनों वापस बुलेट पर थे और मनाली की ओर बढ़ चले । नूपुर लगातार मेरा हौसला बढाती रही जबकि कीचड़ में सनी पेंट के अन्दर घुटना दर्द-भरे नगमे गा रहा था । #लंगड़ा_त्यागी

शाम 6 बजे दोनों गिरते-पड़ते अलेऊ पहुंचे जहां हमने अगले कुछ दिनों के लिए ‘ओलिव काउंटी रिसोर्ट’ को अपना डेरा बनाया । 24 की सुबह नाश्ता करके हम सोलंग वैली पहुंचे जहां हमने ‘स्काईरनिंग’ इवेंट के रूट की हाफ रैकी पूरी करी । अगले दिन 25 को हमने बाकी बचे रूट को कवर करके अपना काम समाप्त किया, इस रूट पर हमने 2 दिन में 30 किमी. की पैदल दूरी तय करी । अब हम तैयार और आजाद थे ‘पपप’ (पिन पार्वती पास) के लिए ।

26 (दिन 01) की सुबह बुलेट ‘ओलिव काउंटी रिसोर्ट’ में ही छोड़कर हमने मनाली बस स्टैंड से बरशैनी की बस ली । मनाली से बरशैनी 91 किमी. दूर है और 2212 मी. की ऊँचाई पर है ।

हम पार्वती घाटी में हैं और यहाँ का माहौल जुदा जुदा सा है बाकी हिमाचल से । जहां तक नज़रें जाएँ वहीं तक देशी ढ़ाबे विदेशी नामों के साथ अपने-आपको पूरी तरह इजराइली और कूल दिखाने का प्रयास कर रहे थे । जहां घाटी में घूमते कुछ-एक विदेशी पहाड़ों और नदियों को देख रहे थे वहीं अपने देशी भाई विदेशियों और उनके पहनावे को घूरकर ऐसे देख रहे थे जैसे कहना चाह रहे हो कि “तुमने हमारे देश की संस्कृति का बेड़ा-गर्ख कर दिया” । नज़रें जब 45 डिग्री एंगल पर घूमी तो पता चला ‘देशी संस्कृत प्रेमी’ कुछ विदेशियों के साथ सेल्फी ले रहें हैं । ले_होली_जिप्सी_कैफ़े

बरशैनी में एक बहुत बड़ा जम्बो बाँध बनाया जा रहा है घाटी में बढ़ती बिजली की पूर्ति के लिए । पपप का रास्ता इस जम्बो डैम के दाईं और बाईं दोनों तरफ से जाता है । दायाँ रास्ता ‘नक्थान’ गाँव से आपको खीरगंगा ले जायेगा वाया ‘रूद्रनाग वाटर फाल’ और बायाँ रास्ता ‘कल्घा गाँव’ से होते हुए सीधे खीरगंगा उतरेगा वाया ‘आईसी’ ।

बरशैनी के ‘शिव रेस्तोरेंट’ में 2-2 तंदूरी पराठे पेलकर हमने अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाएं । कल्घा से खीरगंगा तक बहुत बढ़िया ट्रेल बनी हुई है अगर कोई दौड़ने का शौक़ीन है तो दौड़कर भी गर्म पानी तक पहुंच सकता है । खीरगंगा तक रास्ते पर कहीं भी चढ़ाई नहीं है, एंड तक रास्ता लगभग समतल है । बरशैनी से खीरगंगा की पैदल दूरी मात्र 9 किमी. है जिसमें 647 मी. का हाईट गेन होता है । खीरगंगा की हाईट 2859 मी. है और हम 2 घंटे 40 मिनट में यहाँ पहुंचे ।

इन्टरनेट पर जितना इस ट्रेक को बेचा जा रहा है शायद उतनी पब्लिसिटी तो ‘मलाणा क्रीम’ को भी नहीं मिल रही । पार्वती घाटी में टूरिस्ट 'क्रीम' और 'खीरगंगा' की फ़िराक में आता है । जब बेहद खुबसूरत महिला को अत्यधिक मेकउप भद्दा बना सकता है तो यह तो फिर भी हिमालयी गर्म पानी का कुण्ड है । क्या आप यकीन मानोगे कि यहाँ 1500 से ज्यादा टेंट लगे हैं और प्रत्येक का किराया 1000 रु. से ज्यादा है । 40 रु. की साधा रोटी यहाँ की खुबसूरत कहानी को ब्यान करती है ।

मैं पहली बार खीरगंगा आया था और पहली ही बार में इस प्रोडक्ट की टी.आर.पी. का राज समझ गया । इस जगह की बेहिसाब महंगाई ने इसको टूरिस्टों के नाम कर दिया है । देशी घुमक्कड़ों को यहाँ अपना टेंट और खाना ले जाने की सलाह देता हूँ । #नॉट_फॉर_ट्रेवलर्स

सूरज ढ़लने से पहले ही हमने अपना 2 मैन टेंट तान दिया था और अब वक़्त था गर्म पानी में डुबकी मारने का । जल्द ही मैं भांप के बीच था जो कुण्ड से निकल रही थी । मणिकर्ण का पिछला अनुभव सिरदर्द था इसलिए यहाँ पूरे 12 मिनट बाद ही मैं कुण्ड से बाहर आ गया ।

अगली बारी नूपुर की थी जिसने आज तक कभी भी गर्म पानी के कुण्ड का स्वाद नहीं चखा था । महिलाओं के लिए कुण्ड के एक हिस्से को पूरी तरह कवर किया हुआ है । मैं टेंट में बैठा ढ़लते सूरज की फोटो लेने की कौशिश कर रहा था कि तभी नूपुर लौटती दिखी । उसका चहेरा हवा-हवाई लग रहा था । उसके हिसाब से वो मौत के मुंह से बाहर आई है । बाद में उसने बताया कि “पहले तो गर्म पानी बहुत अच्छा लगा लेकिन जैसे ही कुण्ड से बाहर निकली वैसे ही मैं बेहोश हो गई” । आगे उसने बताया कि आसपास बैठी स्थानीय औरतों ने बताया कि यहाँ ऐसा होना प्राकृतिक है । पानी में विलीन सल्फर हमेशा अपने पहले ग्राहक को स्वर्णिम यात्रा करा ही देता है ।

हम सिर्फ 5 दिन का राशन ही लेकर गये थे और खीरगंगा को हमने इन 5 दिनों में नहीं गिना था । ऊपर से यहाँ का महंगा मेनू हाथ-पैर धोकर इस राशन को 4 दिन पर लाना चाहता था । 30-35 मिनट तक हमने कुछ ढाबों को खंगाला और अंत में 200 रु. की दाल और 40 रु. की एक चपाती का आर्डर दे ही दिया । नो डाउट खाना अच्छा बना था । महंगाई डायन के डर से हमने 2 चाय के पियाले अपने छोटू चूल्हे पर बनाये ।

27 (दिन 02) की सुबह जब आँख खुली तब सूरज की किरनें इस घाटी में आने को बेताब दिखी । आज स्थानीय देवता यहाँ आयें है 40 साल बाद स्नान के लिए । स्थानीय लड़के मुकेश ने बताया कि “जब भी देवता के मंदिर का पुनर्निर्माण होगा तब तब देवता को यहाँ स्नान के लिए लाना होता है” ।

आज टेंट ठाकुर कुआँ में गाड़ने का प्लान है । खीरगंगा से निकलते-निकलते 10 बज गए, चाय-नाश्ता बनाने की वजह में हमे निकलने में देर हो गई ।

रास्ता अच्छा और सुंदर नज़रों से भरा हुआ था । पगडंडीया शांत थी यहाँ खीरगंगा के टूरिस्टों का शौर नहीं था । घने  देवदार और बाँझ के पेड़ों के बीच कई जगह बड़े लैंड-स्लाइड दिखाई दिए । पीने के पानी की भी कोई दिक्कत नहीं थी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मीठे पानी के झरने बह रहे थे । रास्ते में हमे 3 गद्दी भाई मिले जो कि अपने डेरे की ओर जा रहे थे । उन्होंने बताया कि थोड़ा आगे जाकर गुज्जरों का डेरा आयेगा जहां से पीने को दूध मिल जायेगा । बीहड़ में दूध के नाम ने हमारी स्पीड और बढ़ा दी ।

अगला सीन यह था कि हम गुज्जर के डेरे में 2 गर्मागर्म दूध के गिलास अपने हाथों में लिए बैठे थे । दूध मीठा, गर्म और 70 रु. प्रति किग्रा. था । पपप जाने वाले ग्रुप के गाइड और पोर्टरों ने यहाँ से दूध खरीदने का रिवाज चलाया है । बाद में इस रिवाज ने उघोग का नकाब पहन लिया । एक-एक गिलास पीने के बाद हमने 1 लीटर पानी की बोतल में भरवा लिया ।

हम टुंडा भुज पहुंचने वाले है और रास्ता अभी भी हमारे लिए अच्छा बना हुआ है । कहीं-कहीं छोटे लैंड स्लाइड आते हैं, फिर कहीं पानी के खड्ड । रास्ते ने कभी हमे ऊपर चढ़ाया तो कभी नीचे उतारा । कई बार नदी ने खुद पर बने लड़की के पुल से हमे पार लगाया । मौसम साफ़ था और सूरज अब सिर से होते हुए कंधे पर दिखाई दे था । रास्ते में 2 नेपाली मिले उनमें से एक काले रंग का बड़ा बॉक्स उठाकर भागे जा रहा था । बात करके पता चला कि मौसम विभाग की रिसर्च टीम टुंडा भुज में बैठी है यह सामान वहीं जा रहा है ।

सराय जैसी दिखने वाली बिल्डिंग के पास पहुंचकर हमें खड्ड पार 2 टेंट लगे दिखाई दिए । दोनों टेंटों और घास के मैदान ने उस स्थान को टुंडा भुज होने प्रमाण दिया । सराय के आसपास काफी सारे लाल रंग के झंडे लगे हुए थे । स्थानियों के अनुसार पहले यह फारेस्ट वालों का रेस्ट हाउस था परन्तु कुछ सालों पहले रशियन बाबा के साथ आये एक बाबा ने यहाँ डेरा डाल लिया है । उन्होंने आगे बताया कि बाबा वावा कुछ नहीं है 10 रु. की चाय को 40 में बेचता है । #भांग_बीहड़_बाबा_बिजनेस

सुबह 10 बजे चलकर हम टुंडा भुज दोपहर 1:30 बजे पहुंचे । खीरगंगा से टुंडा भुज की दूरी 9 किमी. है और ऊँचाई 3365 मी. है । यहाँ 2 टेंट लगे थे मौसम विभाग टीम के और हमारा प्लान था लंच करके यहाँ से जल्द-से-जल्द ठाकुर कुआँ पहुंचने का । प्लान में तब बदलाव आया जब नूपुर ने बताया कि उसे अच्छा महसूस नहीं हो रहा है ।
धूप और हमारा नसीब तेज था । मौसम टीम ने हमे लंच के साथ-साथ कॉफ़ी भी पिलाई । यह दल पिछले 2-3 सालों से इस घाटी में आता रहा है, इनका काम बदलते मौसम पर नज़र रखना है और सभी तथ्यों को एकत्रित करना है । अब यह दल पूरे 30 दिनों के लिए यहीं रहने वाला है । पिछले साल यह टीम मानतलाई में बैठी थी महीने भर के लिए जहां इन्होंने पार्वती ग्लेशियर के सैंपल इकठ्ठे किये थे ।

यह एक घास का मैदान है जहां पपप जाने वाले ग्रुप एक नाईट स्टे करते हैं । हमने भी अपना टेंट यहीं लगा लिया । हमारे पीछे-पीछे ही एक और ग्रुप यहाँ पहुंच गया जिसमे 2 रशियन और एक लोकल गाइड था । इन्होने भी टुंडा भुज को ही अपना आशियाना बनाया |

शाम को लोकल गाइड जिसका नाम ‘शिवराम’ था को लकड़ियों पर खाना बनाना पड़ा क्योंकि उनका पेट्रोल से चलने वाला चूल्हा समय पर धौका दे चुका था । उनके बोनफायर के पास मैं, नूपुर और मौसम विभाग की टीम भी बैठी थी । कोई भी हमारे अकेले पिन पार्वती पास जाने के पक्ष में नहीं था । उनके हिसाब से अकेले जाने पर हम रास्ता भटक सकते हैं, रास्ते में भालू मिलेगा जो हमे अपना लंच बना लेगा, और अगर भालू से बच गये तो ग्लेशियर पर बनी चौड़ी क्रेवास हमें निगल लेंगी । जब डराने में थोड़ी कमी रह गई तो शिवराम ने माइनस तापमान का सहारा लिया और अंत में अपने-अपने टेंट में जाने से पहले वो सिर्फ इतना ही कह पाया कि “मानतलाई तो पहुंच ही जाओगे” ।

मौसम विभाग टीम ने तहेदिल से हमारा स्वागत अपने टेंट में किया जहां हम सबने एकसाथ पेट भरकर स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाया । कल का प्लान उड़ी थाच रुकने है ताकि एक दिन की भरपाई की जा सके । बेशक शिवराम से मुझे मानतलाई से आगे के रास्ते की जानकारी लेनी थी लेकिन आज सही समय नहीं है उससे इस विषय पर बात करने का । आशा करता हूँ कल वो हमें डराना नहीं चाहेगा और आगे के रास्ते की सही-सही जानकारी दे देगा ।

रात को 10 बजे हम भी अपने अपने स्लीपिंग बैग में घुस गये । गर्म और मखमली मजा ही आ जाता है इस बोरे में घुसकर । सोने से पहले सिर्फ एक ही ख्याल दिमाग में आया कि “रास्ता भटकना, ग्लेशियर, क्रेवास सब ठीक हैं लेकिन ये भालू बीच में कहां से आ गया” ।

बरशैनी से खीरगंगा जाते रास्ते 

सच्चाई तुम हो परन्तु अपरिचित

5 स्टार ट्रेल्स पर ढ़लती शाम 

खीरगंगा, पार्वती घाटी 

सराय ऐट खीरगंगा

सुपरमार्किट ऑफ़ खीरगंगा

और देवता का आगमन हुआ शहनाइयों और आस्था के साथ 

मोस्ट वांटेड प्लेस अमंग टूरिस्ट्स

खीरगंगा द रिहायशी इलाका 

डर लगता है डूबने से पर यहाँ नहीं 

गुज्जरों का डेरा 

बाबा का गेस्ट हाउस 

हमारी नीली कुटिया हरे कालीन पर

मौसम विभाग टीम ऐट टुंडा भुज

जहां होना ही जीवन की सफलता है (PC : Nupur)

भाग-2 : टुंडा भुज-उड़ी थाच-मानतलाई झील

14 comments:

  1. बहुत खूब रोहित भाई ।अगले भाग की प्रतिक्षा

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    1. छप गया है भाई जी....धन्यवाद्

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  2. अगले भाग की बेसब्री से प्रतिक्षा में

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    1. प्रतीक्षा समाप्त जनाब, पोस्ट कर दिया है

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  3. बहुत ही बढिया।

    मेरा भी पिन पार्वती पास करने की इच्छा है, पर बिना गाइड के ही कर सकता हूँ।

    पहले डरता था पर आज आपका ब्लॉग पढ़कर यह इच्छा भी बलवती हो गयी

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    1. कोई भी कहीं भी अकेले जा सकता है सटीक जानकारी के आधार पर...अगले साल पक्का जाना, अकेले जा सकते हैं ट्रेक आसान है ।

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  4. अकेले चले गये, पपप तो मुझे भी जाना था।

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    1. पपप आपका बेसब्री से इन्तजार कर रहा है, उसने मुझे आपको शुभकामनाएं देने को बोला है । "शुभकामनाएं", पपप की तरफ से ।

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  5. शानदार विवरण देवता जी पपप तो मुझे भी आना है आप प्लान बनाइये

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