Thursday, August 24, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : थाचडू-भीम डुआरी (2 Kailash visited in 1877 rs. : Thachdu-Bhim Dwari)

23 जुलाई 2017
बाहर से छनकर आती रोशनी ने पलकों को खुलते ही चिकोटी काटी और नये दिन में स्वागत किया । पीली-सफ़ेद तिरपाल से बने टेंट के भीतर कोई 15 यात्री हरे-नीले कम्बलों में अभी भी नींद के आगोश में थे । बाहर यात्रियों की आवा-जाही शुरू हो चुकी थी और रह-रहकर ‘हर हर महादेव’, के जयकारें कानों को सुनाई दे रहे थे । न घड़ी, न मोबाइल और न ही किसी और प्रकार का डिवाइस पास था जो समय की पहचान करा सके । कुछ मिनटों बाद बगल में लेते एक लड़के को जब बार-बार करवटें बदलते देखा तो तुरंत पूछ लिया कि “भाई जी टाइम कितना हुआ होगा ?”, जवाब उनके कम्बल के भीतर से ही आया “साढ़े पांच” ।
जवाब मेरी सोच के अनुकूल नहीं था क्योंकि मैंने स्लीपिंग बैग में लेते-लेते अनुमान लगाया था कि समय 6 से 7 के बीच होगा पर अब जब सही समय का पता चल गया है तो क्यों न इस नये ताजा दिन की शुरुआत की जाये ।

Monday, August 21, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : शिमला-थाचडू (2 Kailash visited in 1877 rs. : Shimla-Thachdu)

22 जुलाई 2017
40 मिनट इंतजार के बाद सफ़ेद-हरे रंग में रंगी HRTC की बस आई जिसके माथे पर हिंदी भाषा में “हिमाचल परिवहन” लिखा हुआ था । भीतर दुधिया लाइट जगमगा रही थी, ज्यादातर सवारियां यहीं उतर गयीं और जो बैठी रह गयीं उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता था । अपने दोनों बैगों के साथ पिछले गेट से जैसे ही पायदान पर आया वैसे ही कंडक्टर की कड़वी आवाज सुनाई दी “अरे कहां चढ़ रहे हो ये बस कहीं नहीं जा रही है, चलो नीचे उतरो” । मेरे साथ चढ़ी कुछ सवारियां एक दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगी जैसे सभी से जीने की आखिरी उम्मीद भी छीन ली गई हो । मेरे बोलने से पहले ही एक सफ़ेद बालों वाले 50-55 साल के अंकल जी को गुस्से का भयानक दौरा पड़ा और जोर से चीखे “जहां से ये बस जा रही है वहीँ जा रहे हैं और कहां, तू होता कौन है हमें उतारने वाला”, “रामपुर का बोर्ड तो लगा है बस के सामने”, उनकी आड़ में मैंने भी अपना गुस्सा दिखाया, जोकि गुस्सा कम चापलूसी ज्यादा लग रहा था ।

Friday, August 18, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : बीड़-शिमला (2 Kailash visited in 1877 rs. : Bir-Shimla)

21 जुलाई 2017
“जब जेब में पैसे हों तो दिमाग अलग तरह से काम करता है और जब नहीं हों तो काम कम करता है भटकता ज्यादा है । मैं भी इसी भूल-भुलैया में लम्बे समय तक भटकता रहा । अब जो याद है वो ये कि 'कभी अकेले घूमता था खुद के साथ दीवानों की तरह' । फरवरी 2016 के बाद बहुत सी जगहें घुमा लेकिन जहां कदम अकेले चले वो जगह थी चादर ट्रैक” ।