Wednesday, April 19, 2017

यमुनोत्री : 100 रु के कमरे में रोया, भाग-1, Yamunotri : Cried in the room of Rs. 100, Part-1

नई नौकरी पकड़े हुए अभी 6 महीने ही हुए थे और छोड़ने में 6 मिनट भी नहीं लगे । परिवार में हुई एक के बाद अचानक 2 लोगों की मृत्यु ने पुरे परिवार के साथ मुझे भी तोड़ दिया था । जितने भी लोगों ने अपने करीबी लोगों की आखिरी सांसों को बेहद करीब से महसूस किया है वो इसे समझ सकते है कि कैसे ये समय हमें तन और मन से विक्लांग बना देता है और मेरी ही तरह सभी लोग इस बात से भी सहमत होंगे कि समय सभी घावों को भर देता है परंतु थोड़ा समय जरुर लेता है । जहां घर पर सभी के मन जो हुआ है उसे फिर से अन-हुआ करना चाहते थे वहीँ मेरी पतंग की डोर यहाँ से टूटकर हिमालय के शिखरों पर उड़ना चाह रही थी । लगातार एक महीने शौक के भंवर में उड़ने के बाद आख़िरकार डोर टूट गई और पतंग “यमुनोत्री” में गिरी पहुंच गई ।

Thursday, April 13, 2017

मेरी पहली यात्रा कौनसी थी ? Which was my first trip?

ना जाने कितना टाइम बीता, पता नहीं....
ना जाने कितने ब्लॉग पढ़े, याद नहीं......
लाखों-करोड़ों विचार आए, पकड़े नहीं.....
और अब आलम ये है की बैठा हूँ सवारने ।

Friday, April 7, 2017

नैनीताल के चश्मे (फोटो स्टोरी) Nainital's Glasses (Photo story)

एक समय की बात है जब मेरी नई-नई पहाड़ों से जान-पहचान हुई थी । मेरे दो दोस्त इस जान-पहचान को रिश्तेदारी में बदलने के लिए मुझे नैनीताल ले जाना चाहते थे लेकिन मैंने मना कर दिया क्योंकि मेरा सारा काम ऑफिस के भूतिया कंप्यूटर पर ही होता था नहीं तो कौन कमबख्त रिश्तेदारी नहीं बनाना चाहता था और वो भी पहाड़ों से लेकिन समस्या थी बरगद से पेड़ सा भीमकाय कंप्यूटर जिसे बैग में डालकर नैनीताल नहीं ले जाया जा सकता था । समस्या का हाल मास्टर साब ने सुझाया जब उन्होंने अपना लैपटॉप साथ लेकर चलने बात कही । मास्टर का लैपटॉप बॉस के सामने लालीपॉप की तरह रख दिया जिसे मुहं में डालते ही उन्होंने “हाँ” की मोहर लगा दी इस सफ़र के लिए ।