Thursday, April 13, 2017

मेरी पहली यात्रा कौनसी थी ? Which was my first trip?

ना जाने कितना टाइम बीता, पता नहीं....
ना जाने कितने ब्लॉग पढ़े, याद नहीं......
लाखों-करोड़ों विचार आए, पकड़े नहीं.....
और अब आलम ये है की बैठा हूँ सवारने ।
काफी समय से ब्लॉग लिखने की सोच रहा था लेकिन कभी नहीं लिखा । कलम हमेशा हाथ में रही पर शार्पनर से छिला कभी नहीं । इन्टरनेट के पेजों को खाली ही रहने दिया, जबकि अपनी डायरी को नीले पेन से रंगता ही गया । तो अब अपनी की जा चुकी यात्राओं का ब्यौरा यहाँ इन्टरनेट पर पब्लिश करने जा रहा हूँ इस उम्मीद में कि इस यात्रा को मैं सुचारु रूप से जारी रखूँगा ।

लेकिन पिछले कुछ समय से बहुत से लोगों ने एक सवाल दागना शुरू कर दिया कि “ मेरी पहली यात्रा कौनसी थी ?” जब पहली बार इस सवाल पर विचार किया तो दिमाग ने इस सवाल को पहले तो सिरे से ही नकार दिया, लेकिन दूसरे ही पल अजीब सा जवाब भी दिया “ भला ये भी कोई सवाल है ” । अब जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो याद आते हैं कुछ स्वर्णिम पल जहाँ मैंने इस सवाल की खोजबीन की ।

“जय माता दी” का नारा सुनते ही मुझे कुछ समझ नहीं आया शायद 9 साल की उम्र में भीड़ भरी बस में भक्ति संगीत को पचाना काफी आसान था जबकि पेट के मरोड़ को नहीं । हमसब बस से जम्मू क्रॉस करके कटरा जा रहे थे पहाड़ी घुमावदार रास्तों से होते हुए माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए । बाद में मुझे पता चला की ये भी मेरी पहली यात्रा नहीं थी ।

“जब तू छोटा था तब तेरी पहली यात्रा हुई थी”, मम्मी का ये जवाब, जवाब से ज्यादा और मुश्किल सवाल बन गया । बाद में मेरे पूछे गए कब, कहाँ, कैसे, क्यों के सवालों का मम्मी ने एकसाथ जवाब दिया ।
“2 साल की उम्र में हम तुझे हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर शहर ले गए थे जहाँ बाबा बालकनाथ के मंदिर जाकर तेरा मुंडन कराया था” । बेशक मुझे सवाल का जवाब मिल गया था लेकिन जवाब मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया । करता भी कैसे 2 ही साल तो हुए थे मुझे इस दुनिया में आये हुए ।

एकदिन मैंने स्नोलाइन-कैफे के सामने बैठकर धौलाधार को निहारा और सोचा कि मैंने इन्द्रहार पर चढ़ाई की या इन्द्रहार ने मुझपर । सवाल में ही जवाब था कि मैंने यात्रा कभी नहीं की बल्कि “यात्रा खुद हो गयी” । जैसे नदी को कभी किसी ने जन्म नहीं दिया बल्कि वो तो हो गई ऐसे ही मुझे लगता है कि यात्रा की नहीं गई बल्कि हो गई ।

जन्म के 7 साल बाद सन् 1993 में पहली बार मुझे स्कूल नामक दैत्य के साथ दो-दो हाथ करने का मौका मिला लेकिन युद्ध ज्यादा समय नहीं चल सका क्योंकि स्कूल रूपी साहूकार ने मेरे माँ-बाप की छोटी सी बचत कुछ महीनों में खत्म कर दी ।

1994 में दूसरी बार मुझे फिर से स्कूल जाने का सौभाग्य मिला । यहाँ मुझे 5 साल जी-तोड़ मेहनत करनी थी । परिवार में सभी सदस्यों के मुहँ से बार-बार मेहनत शब्द सुनकर मुझे ऐसा लगने लगा की मैं स्कूल नहीं कोयले की खदान में जा रहा हूँ । “ये स्कूल पिछले वाले से बहुत अच्छा है”, घरवाले हमेशा कहते लेकिन मैं जानता था कि सरकारी स्कूल गरीब माँ-बाप के लिए टिमटिमाते तारे जैसा है जिसके सहारे ये सोचते हैं कि यहाँ पढ़कर हमारा बेटा भी दुनिया में तारे की तरह चमकेगा । ये स्कूल मुझे कभी पसंद नहीं आया क्योंकि तारे पर यहाँ हमेशा ग्रहण ही लगा रहा । जात-पात के चलते 5 साल कड़ी मेहनत करके भी मैं कभी कोई डिविजन नहीं ला पाया । तब समझ ही नहीं आता था की ग्रहण मेरी छोटी जात ने लगाया है या उन अध्यापकों के रवैये ने मेरे प्रति ।

1999 खुशी का साल था जब बहुत धक्के खाकर आखिरकार मेरा दाखिला दिल्ली के सरकारी हाई स्कूल में हुआ । पिछले 5 साल का घाव अभी भरा भी नहीं था कि हाई स्कूल के माहौल ने इसे पहले ही दिन से हरा कर दिया । यहाँ मुझे अपनी ज़िन्दगी के 7 साल बिताने है और मुश्किल ये है की ये कैसे कटेंगे ? पहले 3 साल काफी बुरे गुजरे, तीनों साल IInd डिविजन से संतोष करना पड़ा लेकिन आठवी कक्षा में आकर मेरी ज़िन्दगी ने मुझे अपनी बाँहों में झुलाना शुरू कर दिया । जी नहीं डिविजन-विविजन कोई नहीं आई बल्कि हफ्ते में दो दिन मिलने वाले 6-6 केलों के लालच ने मुझे एन.सी.सी (N.C.C) में दाखिला दिला दिया । अब पढ़ाई से ज्यादा एन.सी.सी में दिल लगने लगा और हाँ पेट भी ।

2004 में ग्यारहवीं में आते ही मैंने पढ़ाई के साथ-साथ अपनी जिम्मेवारी उठाने का फैसला किया, जिसके तहत मैंने अखबार डालने का काम शुरू कर दिया । सुबह 4 बजे उठकर साइकिल पर न्यूज़पेपर ऐजन्सी जाता और घर-घर जाकर अख़बार डालता । पहले साल 600 रु मिलते थे हर महीने के हिसाब से । मेहनत को देखते हुए मालिक ने दूसरे साल तनख्वाह 200 रु और बढ़ा दी और काम भी । स्कूल से मिली रविवार की छुट्टी तो अखबार के बिल वसूलने में ही निकल जाती ।

बिना रेस्ट की ज़िन्दगी ने मुझे आईना दिखाया जब मेरे बारहवीं के बोर्ड एग्जाम थे । डॉ ने बताया की मुझे टी.वी. की बीमारी ने घेर लिया है और अब मैं एग्जाम नहीं दे सकता क्योकि 43 किलोग्राम का शरीर अब किसी भी काम के लिए प्रयाप्त नहीं रह गया है । लेकिन फिर भी ऑटो में जा-जाकर मैंने अपने इम्तिहान पुरे किये । एग्जाम के बाद हॉस्पिटल में दाखिल हुआ । हॉस्पिटल से पास होते ही स्कूल का नतीजा भी अच्छा आया, 53% से पास हो गया था । जहाँ नतीजों ने ख़ुशी का अहसास दिया वहीँ नौकरी ने गम का । बचत और नौकरी दोनों ही बीमारी के साथ पलायन कर गये ।

2006-2008: दिल्ली युनिवर्सिटी की IIIrd कट ऑफ ने मेरे मन में हलचल मचा दी क्योंकि वहां एडमिशन के लिए मेरे 2% नंबर कम थे । 55% पर बी.ए में एडमिशन मिल रहा था जबकि मेरे थे सिर्फ 53%, पुरे के पुरे 2% कम । यहाँ डूबती नाव को सहारा दिया एन.सी.सी के सर्टिफिकेट ने जिसकी वजह से मुझे 5% की छुट मिल गयी । हिप-हिप हुर्रे, 4000 रु फीस कालेज में देकर दाखिला पक्का किया ।

2009 पहली बार मैंने प्रोफेशनली प्राइवेट कंपनी में कम शुरू किया जहाँ शुरुआत 5140 रु से हुई । धीरे-धीरे पैसा बढ़ता गया साथ ही काम और मेहनत के घंटे भी । 2013 में जाकर मैंने काम छोड़ा तब तक में 5-6 कंपनियों में कम कर चूका था । साइकिल के कैरियर से शुरू हुई नौकरी लैपटॉप के इंटर पर ख़त्म हुई । 600 रु के पेपर डालने से कम शुरू किया था और 20120 रु पर इसका अंत हुआ ।

काम छोड़ने की मुख्य वजह थी मेरी हिमालय में बढ़ती दिलचस्पी और इसी शौक को पूरा करने के लिए कम्पनी ने छुट्टी बंद कर दी ऊपर से काम के घंटे 12 से 14 कब हो गए पता ही नहीं चला । नॉन-स्टॉप 14 घंटों ने एकबार फिर से मुझे हॉस्पिटल के बैड पर लाकर पटक दिया । एम्.आर.आई की रिपोर्ट पढ़कर डॉ साब ने फ़िल्मी अंदाज में घोषित किया की मेरे दिल ने भीतर अनशन कर दिया है मतलब की खून की सप्लाई में अड़चन हो रही है, अगर इलाज जल्दी नहीं किया गया तो अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है । रिपोर्ट में जो था वो सच में सीरियस था लेकिन सफ़ेद बालों वाले डॉ साब ने उसे जिस तरह मुहं बनाकर बताया वो काफी मजेदार था । कभी-कभी तो लगता है जैसे एम्.बी.बी.एस. के साथ साथ सभी डाक्टरों को बुरे एक्सप्रेशन बनाने का कोर्स भी कराया जाता है ।

17 दिन हॉस्पिटल में एडमिट रहने के बाद 19वे दिन मैं अपने 2 दोस्तों के साथ गौमुख पर था । दिल की बीमारी के चलते डॉ ने कम चलने और ज्यादा आराम करने को कहा था । मेरे ख्याल से 14km जाना और 14km आना कोई ज्यादा लम्बा चलना तो नहीं माना जायेगा या माना जायेगा ?

यही वो समय था जब मैंने 4-5 साल से चलती आ रही नौकरी का साथ छोड़ा और घुमकड़ी का दामन पकड़ा । और तब से अब तक इसी रस्ते पर आगे बढ़ने के प्रयास घोर रूप से जारी हैं । अच्छा इस बीच मैंने माउंटट्रेंनिंग के 2 कोर्स भी पुरे किये ।

बेसिक माउंटट्रेंनिंग कोर्स, 2015 में उत्तरकाशी (उत्तराखंड) के नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटट्रेंनिंग से पूरा किया ।
एडवांस माउंटट्रेंनिंग कोर्स, 2016 में दार्जीलिंग (वेस्ट बंगाल) के हिमालयन माउंटट्रेंनिंग इंस्टिट्यूट से पूरा किया ।
दोनों ही कोर्स में ग्रेड “A” मिला । जल्द ही इस फील्ड के तीसरे कोर्स “सर्च एंड रेस्क्यू” के लिए भी अप्लाई करना शेष है ।

मेरी घुमकड़ी 2 आधार पर हुई, पहली – ट्रैकिंग और दूसरी – साइकिलिंग । ट्रैकिंग मैंने जम्मू एंड कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में की जबकि साइकिलिंग भारत के लगभग 10-11 राज्यों में की । अपनी इस जर्नी के दौरान हजारों-लाखों लोगों से मिलना हुआ, उन्हें समझना हुआ, हिमालय की छाँव मिली और सबसे आगे खुद से मिला ।

बहुत कोशिश की लोगों को समझने की लेकिन ज्यादातर वक़्त नाकामयाब रहा लेकिन जब खुद को समझना शुरू किया तब सबको समझने में कामयाबी मिली । अब महसूस होता है की यात्रा भीतर से बाहर की ओर नहीं बल्कि बाहर से भीतर की ओर हुई । मैं इसे यात्रा नहीं मानता, ये तो एक पवित्र तीर्थ हो गया है मेरे लिए ।

मेरे तीर्थ में आप सभी का तहेदिल से स्वागत है ।

नमस्कार ।

Himalayan womb Rohit kalyana
2007 : कंप्यूटर क्लास से बंक मारकर दोस्तों के साथ ताज महल घुमने का मौका मिला

Himalayan womb Rohit kalyana
2008 : दिल्ली यूनिवर्सिटी में अपने अंतिम साल के ख़त्म होने की भावुकता

Himalayan womb Rohit kalyana
2009 : अपनी पहली प्राइवेट नौकरी के दौरान

Himalayan womb Rohit kalyana
2010 : तीन दिन की छुट्टी लेकर ऑफिस से बद्रीनाथ के रस्ते पर कहीं

Himalayan womb Rohit kalyana
2011 : कोई तो बात थी उस समय में जब टशन मारने को दिल करता था

Himalayan womb Rohit kalyana
2012 : जामा मस्जिद में गर्मियों की एक दोपहर

Himalayan womb Rohit kalyana
2013 : दवाइयों पर जिंदा फिर भी गौमुख पहुंचा

Himalayan womb Rohit kalyana
2014 : नारनौल, हवामहल के आसपास

Himalayan womb Rohit kalyana
2015 : विंटर पराशर लेक साइकिलिंग 2 अन्य दोस्तों के साथ

Himalayan womb Rohit kalyana
2016 : बीड में एक सेल्फी

26 comments:

  1. इस पहल के लिए ढेरों बधाइयाँ!

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    1. शुक्रिया प्यार देने के लिए

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  2. रोहित भाई मजा आ गया आपकी कहानी पड़ कर।।
    और खुशी इस बात से हुई कि आपने ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया ।।
    बधाईया
    लोकेन्द्र जत्थापी

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    1. शुक्रिया लोकेन्द्र भाई, स्वागत है आपका यहाँ पर। 🙏

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  3. Wahh yha bhi likhna chalu hogaya apka.....maza agya....ye to hamari 100km ride wali story thi...☺☺

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    1. यहाँ आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, हमारी क्या इस कहानी के के तो सभी पात्र हैं।

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  4. खुद की बेहतरीन खोज सर। आज आपके प्रति मन मे इज़्ज़त और बढ़ गयी 💐💐💐

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    1. सूरज भाई इसे वैसा ही समझने के लिए धन्यवाद् जैसा ये है

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  5. Mast yar mara bar Mai nhi likha

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  6. सबसे पहले आप की मेहनत और परिश्रम को सलाम।।बहुत ही ग़ज़ज़्ब ओर बढ़िया लिखा है।।आप के बारे में जानकर इज़्ज़त ओर बढ़ गई।बहुत ही बढ़िया।आप से एक मुलाकात की उम्मीद रहेगी।
    सचिन कुमार जांगडा

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    1. यहाँ आने के लिए धन्यवाद् और जांगड़ा साब आप भी मेहनती और परिश्रमी कम नहीं हैं।

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  7. रोहित भाई आपकी घुमक्कडी को सलाम है। चलते रहो, घुमते रहो और घुमाते रहो... घुमक्कडी जिंदाबाद
    Sachin3304.blogspot.in (मुसाफिऱ चलता चल)

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    1. धन्यवाद् उत्साह बढ़ाने के लिए, कोशिश पूरी है आप सभी की उम्मीदों पर खरी उतरने की।

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  8. आगाज ये है तो अंजाम क्या होगा?keep it up

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    1. शुक्रिया नीरज भाई इस आगाज को सम्मान देने के लिए ।

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  9. रोहित बाबा
    आपको हम सबकी और से ढेर सारी शुबकामनाएं
    आप घूमते रहो और अपनी कलम को भी घुमाते घुमाते ब्लॉग लिखते रहो.

    आपके अपने
    रितेश धीमान (पाजी), अजय बरुआ (बंगाली), मनीष (मस्टर जी), मनीष कुमार (चंडीगढ़), बिरजू (भारत माता की जय)

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    1. शुभकामनाएं जो मेरे लिए सीढ़ी का काम करेंगी, शुक्रिया पाजी,डैनी, मनीष यूपी, मनीष चण्ड़ीगड़ और बिरजू।

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  10. आपने अपने जीवन के संघर्षों का भावपूर्ण लेखन किया है
    आपके जज्बे को सलाम
    बस ऐसे ही लिखते रहिये
    शुभकामना 😀🍁💖

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद भावों की गरिमा को समझने के लिए

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  11. समय के साथ सब कुछ बदलता है, जो काम मन को भाये वही करना चाहिए। शुभकामनाएँ।

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    1. मन की बात कह दी ललित सर, मन के जीते ही जीत है। धन्यवाद

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  12. बहुत अच्छी शुरूआत है।आशा है आगे भी अनवरत हमारा ज्ञानवर्धन होता रहेगा।अब इतना अनुभव तो आपको भी हो गया होगा कि घुमक्कड़ो की दुनिया मे कोई जात पात नही होती।

    आपकी बारे मे पढ कर दिल मे ईज्जत पहले से ज्यादा हो गयी है।

    आपका फेसबुक मित्र anil dixit

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    1. इस अनूठे अनुभव को ज्यों का त्यों समझने के लिए दिल से धन्यवाद। एक और पर्सनल शुक्रिया यहाँ आने के लिए।

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  13. आज आपकी जीवन गाथा भी पढी, उतार-चढाव तो जीवन का हिस्सा है, लगे रहो भाई,

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    1. धन्य हुई गाथा आपके आने से बाकी प्रयास जारी हैं । धन्यवाद्

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